Radha Kund and Shyama Kund, the two most spiritually surcharged Kunds (ponds), are located in a village called Arita about 3 miles north-east of Govardhan and fourteen miles from Mathura and Vrindavan.

       Radha Kund is the holiest place in all of Brahma’s creation. Radha Kund and Shyama Kund represent the eyes of Govardhan, which is in the shape of a peacock. This is the place where Radha and Krishna performed their most intimate and most sweet pastimes.

This place is located in Kamyavana. This is the place where Lord Kameshwar Shiva, best among the Vaishnavas explained goddess Parvati about Shri Radha Tatva or Supreme Entity Shri Radha. Lord Shiva told Parvati Devi to take a vow of thinking about the pleasure of Shri Radha and meditate upon her. Lord Shiva is also known as Kameshwar because he fulfilled goddess Parvati wish here at Kamyavana. The fourth among the twelve forests of Braj-mandal, known as Kamyavana is one among the beautiful forest of Braj.

Surrounding this pond are Pilu trees that produce fruits in abundance. On the pretext of collecting Pilu fruits, Shri Radharani would come here to perform varieties of playful pastimes. Shri Krishn would also come here from Nandagaon and enact many pastimes with Her. Once, during her childhood pastimes, Shri Radhika and Her sakhis went to Nandagaon to see Yashoda Mayia. Charmed by Shri Radha’s beauty and qualities, Yashoda Maiya painted Kishori Ji Shri Radha's hands yellow. Radhika's heart became very happy but, as She returned to Her father’s house in Barsana, She became quite embarrassed. She washed and scrubbed Her hands in this pond, and the pond’s water turned yellow. This pond is therefore called Peeli Pokhar, “the yellow pond”.It is also called Priya Kund. 

Location:
This Pond is located in Barsana, In between Radharani’s temple and Rangeeli Mahal, there lies a small bridge. While taking left from bridge, hardly 1 km inside, you will find Peeli Pokhar. It is very near to Rangeeli Mahal, Barsana.

उद्धव कुण्ड – कुसुम सरोवर के ठीक पश्चिम में परिक्रमा मार्ग पर दाहिनी ओर उद्धव कुण्ड है। स्कन्दपुराण के श्री मभदागवत-माहात्म्य प्रसगड में इसका बड़ा ही रोचक वर्णन है। वज्रनाभ महाराज ने शाण्डिल्य आदि ) श्रीषियो के आनुगत्य में यहाँ उद्धव कुण्ड का प्रकाश किया। उद्धव जी यहाँ पास में ही गोपियों की चरण धूलि में अभिषिक्त होने के लिए तृण-गुल्म के रूप में सर्वदा निवास करते हैं। श्रीकृष्ण की लीला अप्रकट होने पर  कृष्ण  की द्वारका वाली पटरानियाँ बड़ी दुःखी थीं। एक बार वज्रनाभजी उनको साथ लेकर यहाँ उपस्थित हुए। बड़े जोरोंसे सप्रीर्तन आरम्भ हुआ। देखते-देखते उस महासप्रीर्तन में कृष्ण के सभी परिकर क्रमशः आविर्भूत होने लगे। अर्जुन मृदड् वादन करते हुए नृत्य करने लगे। इस प्रकार द्वारका के सभी परिकर उस सप्रीर्तन मण्डल में नृत्य और कीर्तन करने लगे। हठात् महाभागवत उद्धव भी वहाँ के तृण गुल्म से आविर्भूत होकर नृत्य में विभोर हो गये। फिर भला कृष्ण  ही कैसे रह सकते थे? श्रीमती राधिका आदि सखियों के साथ वे भी उस महासप्रीर्तन रास में आविर्भूत हो गये। थोड़ी देर के बाद ही वे अन्तध्र्यान हो गये। उद्धव जी ने द्वारका की महिषियों को यहीं पर सांत्वना दी थी। यहाँ श्रीगोवर्धन की परिक्रमा करने वाले परिक्रमा-मार्गसे श्रीराधा कुण्ड आदि की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ते हैं। श्रीराधा कुण्ड आदि की परिक्रमा और दर्शनीय लीला स्थलियों का वर्णन पहले किया जा चुका है। श्रीब्रजमण्डल परिक्रमा के यात्री गोवर्धन-परिक्रमा सम्पत्र कर गोवर्धन या जतीपुरा से नीम गाँव की ओर अग्रसर होते हैं। – कुसुम सरोवर के ठीक पश्चिम में परिक्रमा मार्ग पर दाहिनी ओर उद्धव कुण्ड है। स्कन्दपुराण के श्री मभदागवत-माहात्म्य प्रसगड में इसका बड़ा ही रोचक वर्णन है। वज्रनाभ महाराज ने शाण्डिल्य आदि ) श्रीषियो के आनुगत्य में यहाँ उद्धव कुण्ड का प्रकाश किया। उद्धव जी यहाँ पास में ही गोपियों की चरण धूलि में अभिषिक्त होने के लिए तृण-गुल्म के रूप में सर्वदा निवास करते हैं। श्रीकृष्ण की लीला अप्रकट होने पर  कृष्ण  की द्वारका वाली पटरानियाँ बड़ी दुःखी थीं। एक बार वज्रनाभजी उनको साथ लेकर यहाँ उपस्थित हुए। बड़े जोरोंसे सप्रीर्तन आरम्भ हुआ। देखते-देखते उस महासप्रीर्तन में कृष्ण के सभी परिकर क्रमशः आविर्भूत होने लगे। अर्जुन मृदड् वादन करते हुए नृत्य करने लगे। इस प्रकार द्वारका के सभी परिकर उस सप्रीर्तन मण्डल में नृत्य और कीर्तन करने लगे। हठात् महाभागवत उद्धव भी वहाँ के तृण गुल्म से आविर्भूत होकर नृत्य में विभोर हो गये। फिर भला कृष्ण  ही कैसे रह सकते थे? श्रीमती राधिका आदि सखियों के साथ वे भी उस महासप्रीर्तन रास में आविर्भूत हो गये। थोड़ी देर के बाद ही वे अन्तध्र्यान हो गये। उद्धव जी ने द्वारका की महिषियों को यहीं पर सांत्वना दी थी। यहाँ श्रीगोवर्धन की परिक्रमा करने वाले परिक्रमा-मार्गसे श्रीराधा कुण्ड आदि की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ते हैं। श्रीराधा कुण्ड आदि की परिक्रमा और दर्शनीय लीला स्थलियों का वर्णन पहले किया जा चुका है। श्रीब्रजमण्डल परिक्रमा के यात्री गोवर्धन-परिक्रमा सम्पत्र कर गोवर्धन या जतीपुरा से नीम गाँव की ओर अग्रसर होते हैं।
Uddhava-Kunda is situated exactly west of Kusum-sarovar on the right side of the parikrama path in Goverdhan. Vajranabha Maharaja manifested Uddhava-Kunda under the guidance of Sandilya and other sages. Uddhav Ji always resides near by here as grass and shrubs in order to be sprinkled by the foot-dust of the gopis. The Shrimad Bhagwatam Mahatma of the Skanda Purana gives an interesting description of this place.
After the disappearance of Shri Krishn, His queens in Dvaraka were greatly afflicted by sorrow. Once, Vajrnabh came here with them and they loudly performed sankirtan. In that great sankirtan, all the associates of Krishna started to appear one by one. The associates of Dwarika all sang and danced, and Arjuna began to dance and play mridanga. Suddenly, that exalted soul, Shri Uddhava emerged from the grass and shrubs, and he also became immersed in dancing in that maha-sankirtan. How could Krishna not come there? Finally, He also appeared in that maha-sankirtan ras, along with Shri Radhika and the other sakhis and, after some time, disappeared again. In this way, Uddhava pacified the queens at this place.

Location: 
Uddhav Kunda is Located at Goverdhan near to Kusum Sarovar.

Shri Surabhi Kund

सुरभी कुंड गोवर्धन परिक्रमा मार्ग के दायीं तरफ स्थित है, आगे जाकर आप राघव पंडित की गुफा, और दूसरी तरफ रुद्र कुंड आदि देख सकते हैं। इंद्र देव ने अनुरोध किया तो सुरभी ने कुंड में अपने उदर के दूध के साथ गोविंद जी का अभिषेक किया था। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण की गोचारण लीला तथा विशेषत: श्रीराधा- कृष्ण युगल की निभृत निकुञ्जलीला का दर्शन करने के लोभ से वे श्रीकृष्ण की ब्रज लीला तक यहीं निवास करने लगीं। यह गोवर्धन में स्थित है। महाराज वज्रनाभ ने इनकी स्मृति के लिए इस सुरभि कुण्ड की स्थापना की थी। यहाँ स्नान एवं आचमन करने से सारे पाप, अपराध एवं अनर्थ दूर हो जाते हैं तथा ब्रज का प्रेम प्राप्त होता है।
Surabhi Kund lies on the right-hand side of the Goverdhan Parikrama path, going further you can find Raghava Pandit’s cave, and on the other side Rudra Kunda etc. Surabhi bathed Shri Govinda at Govinda Kunda with the milk from her udder, when Indra requested. Later, out of a strong desire to have the glimpse of Shri Krishn's cow herding pastimes, and especially of the Divine Couple Shri Radha Krishn's confidential pastimes in the Nikunjas, Surabhi dwelt here for the duration of Shri Krishn's manifest pastimes in Braj. This lies in Goverdhan. Vajranabha, the great grandson of Shri Krishn, established this Surabhi-Kunda in her memory. By bathing and performing achamana here, all one’s sins, offenses and unwanted desires (anarthas) are dispelled and one obtains love of Braj

Shri Deh Kund

देह कुंड बरसाना के पास ऊंचा गाँव में स्थित है। यह ललिता सखी का गाँव है। यहां एक बार एक ब्राह्मण ने श्री कृष्ण से कहा, मेरी बेटी विवाह योग्य है, क्या आप मुझे कुछ धन दे सकते हैं? श्री कृष्ण ने कुछ विचार कर कहा, "श्री राधा" ही मेरी एकमात्र संपत्ति हैं, उनके अलावा, मेरे पास कोई मूल्यवान वस्तु नहीं है। "उन्होंने उस ब्राह्मण से कहा ," मैं आपको सिर्फ थोड़ा पैसा ही नहीं अपना पूरा भाग्य देना चाहता हूं। " तब श्री राधा की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "यह मेरी पूरी संपत्ति और धन हैं, कृपया इन्हे स्वीकार करें।" राधा के सिवा मेरे पास कोई प्रिय वस्तु नहीं है।


जब गरीब ब्राह्मण ने यह सुना, तो उसने उदासी में अपने सिर को पीटना शुरू कर दिया। उसने कहा: "मैं अपनी बेटी के लिए उपयुक्त पति की व्यवस्था भी नहीं कर सका अर्थार्त बेटी के लिए वर नहीं ढूंढ सका"। इस तरह श्री कृष्ण ने श्री राधा के वजन के बराबर ब्राह्मण को स्वर्ण दिया। जब राधारानी ने यह सुना कि ठाकुरजी ने उनकी तुलना किसी "वस्तु" से की है तो उन्हें क्रोध आ गया। जिसके बाद ठाकुरजी ने अपनी गलती को अनुभव किया और फिर उन्होंने अपनी प्यारीजु से क्षमा याचना कर रासलीला का आयोजन किया । देह कुंड वह जगह है जहाँ श्री कृष्ण ने श्री राधारानी के वजन के बराबर सोना दान दिया था। यही कारण है कि इस जगह को देह कुंड के नाम से जाना जाता है। श्री राधा के वजन के बराबर स्वर्ण दान करने की इस लीला के कारण, पास के मंदिर को देह-बिहारी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां माना जाता है कि इस स्थान पर स्वर्ण दान करना बहुत शुभ है।


स्थान:
देह कुंड ऊंचा गाँव में स्थित है और ऊंचा गाँव में श्री ललिता सखी के मंदिर से नीचे है। ऊंचा गाँव बरसाना से एक मील पश्चिम में स्थित है। 

Deha Kunda is located at Uncha Gaon near Barsana. It is a village of Lalita Sakhi. Here once one brahmin asked Shri Krishn, I have a daughter of marriageable age, can you please give me some wealth? Shri Krishn thought, “Radha" is My only and entire wealth. But for Her, I possess nothing else of value.” So He told the brahmana, “I want to give you My entire fortune, not just a little money.” He then pointed towards Shri Radha and said, “She is My entire property and wealth. Please accept Her.” There is nothing which is more dearest to me than Radharani. 
When the poor brahmana heard this, he began to beat his head in sadness. He said: "I could not even arrange a suitable husband for my one daughter".

This way Shri Krishn gave gold to the brahmin equal to the weight of Radharani. When Radharani understood, that Thakurji compared her with "thing", then she got angry from him. Then afterwards, Thakurji realized his mistake and again they relished their sweet pastimes. The Deha Kunda is where Shri Krishn gave gold equal to the weight of Shri Radharani to that Brahmin. That is why this place is known as Deha Kund. Because of this pastime of donating Shri Radha’s weight in gold, there is a temple nearby known as Deh-Bihari Mandira. Here it is believed, it is very auspicious to donate gold at this place.

Location:
Deha Kunda is located at Uncha gaon and just below Shri Lalita Sakhi's temple at Uncha Gaon. Uncha Gaon (village) is situated one mile west of Barsana, is the village of Shri Lalita Sakhi

Shri Gopi Kund

दैनिक सुबह के उत्थान को खत्म करने के बाद, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी श्री श्याम कुंड के पूर्व में स्थित गोपी कुप के पानी से स्नान करते थे। फिर वह राधा कुंड में स्नान करते। एक बार, गोपी कुप से पानी खींचते समय, उन्होंने एक गोवर्धन-शिला को कुएं से बाहर निकाला। उस दिन स्नान करने के बाद, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी अपने रास्ते पर चले गए, लेकिन रात में भजन करते समय, उन्होंने कुछ आराम किया। अपने सपने में, उन्होंने देखा कि शिला वास्तव में श्री गिरिराज की जीभ (जिहा) थी। उन्हें श्री गिरीराज से उचित विधि के अनुसार शिला की पूजा करने का आदेश भी मिला। उन्होंने गोविंददेव मन्दिर के प्रवेश द्वार के पास एक मन्दिर बनाया और शिला की उचित रूप से पूजा करने की व्यवस्था की। आज भी यह शिला देखि जा सकता है। इस घटना के बाद, श्री दास गोस्वामी ने गोपी कुप के पानी से स्नान करना बंद कर दिया, और स्नान के लिए ललिता कुंड के पूर्वी तट पर एक नया निर्माण किया। यह नया कुआँ अभी भी वही है।
After finishing the daily morning ablutions, Shri Raghunath Das Goswami used to bathe with the water of Gopi Kupa, situated to the east of Shri Shyam Kund. He would then bathe in Radha Kund. Once, while drawing water from Gopi Kupa, he also drew a Govardhana-Shila out of the well. After taking his bath that day, Shri Raghunath Das Goswami went on his way, but while doing bhajan at night, he took some rest. In a dream, he saw that the Shila was actually the tongue (jihvä) of Shri Giriraj. He also received an order from Shri Giriraj to worship the Shila according to the proper method. He had a temple constructed near the entrance of the Govindadeva Temple and arranged for the Shila to be properly worshipped there. This same Shila can be seen there today. After this event, Shri Das Goswami stopped taking bath with the water of Gopi Kupa and had a new well constructed on the eastern bank of Lalita Kund for bathing. This new well remains there today

Shri Brahma Kund

ब्रह्म कुंड की महिमा:
श्री वृंदावन देवी ने नारद को यहां स्नान करके गोपी का रूप दिया, इस प्रकार महारास के दर्शन की अपनी इच्छा पूरी की जो प्राप्त करना बहुत मुश्किल है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं इस ऐतिहासिक कुंड के महत्व की महिमा की और उनके शिष्य श्रील रूप गोस्वामी ने इस कुंड से वृंदा देवी के देवता को पाया, जो अब कामयावन में स्थापित है। यहां ब्रह्मा-कुंड में श्रिला रूपा गोस्वामी ने वृंदा देवी की खोज की जो कि कुंड के उत्तरी तट पर छिपा हुआ था, देवी स्वयं एक सपने में दिखाई दी और उसे बताया कि वह कहां मिल सकती है। वृंदावन वन की अध्यक्ष देवी वृंदा,मूल रूप से वज्रनाभ महाराज द्वारा स्थापित किया गया था। कुछ विद्वानों ने कहा है कि पवित्र ब्रह्मा के आंसुओं से यह पवित्र कुंड बनाया गया था, जो कुछ समय के लिए यहां बैठे थे जब उन्होंने कृष्णा के अलग होने और चुराए जाने की गलती को महसूस किया था। महान संत श्री बिल्वा मंगल ठाकुर ने इस कुंड में लंबे समय तक भजन किया था। व्रजवासियो के अनुसार, मीरा बाई ने अपनी पहली रात वृंदावन में इस कुंड के पूर्वी घाट पर बिताई। राजस्थान के एक महान भक्त कर्माती बाई जी ने भी इस ऐतिहासिक स्थल पर भजन को लंबे समय तक किया था।

स्थान:
वृंदावन में रंगनाथ मंदिर के उत्तरी परिधि पर स्थित, इस कुंड को ब्रह्मा कुंड माना जाता है।
Glories:
Shri Vrindavan Devi gave Narada the form of a Gopi by bathing him here, thus fulfilling his desire to take Darshana of maha rasa, which is very difficult to obtain. Sri Chaitanya Mahaprabhu, Himself glorified the importance of this historic Kunda and his disciple Srila Rupa Goswami found the deity of Vrinda Devi from this kund, which is now installed in Kamyavan. It was here at Brahma-Kunda that Shrila Rupa Goswami discovered the deity of Vrinda Devi that was lying hidden on the northern bank of the kunda after the goddess herself appeared in a dream and informed him where she could be found. The deity of Vrinda Devi, the presiding deity of Vrindavana forest, and is said to have been originally established by Vajranabha Maharaja. Some scholars have said that this sacred Kunda was formed from the tears of Lord Brahma, who sat here for sometime after he realized his mistake of having stolen Krishna’s calves and cowherd boyfriends.

Great saint Shri Bilva Mangal Thakur did Bhajan for a long time at this kund. As per Brajwasis, Meera Bai spent her first night in Vrindavan on the Eastern Ghat of this kund.
Karmaiti Bai Ji, an exalted devotee, from Rajasthan also did Bhajan for a long time at this historic site.

Location:
Located on the Northern Periphery of Rangnath Temple in Vrindavan, this kund is considered to be the Brahma Kunda.

After finishing the daily morning ablutions, Shri Raghunath Das Goswami used to bathe with the water of Gopi Kupa, situated to the east of Shri Shyam Kund. He would then bathe in Radha Kund. Once, while drawing water from Gopi Kupa, he also drew a Govardhana-Shila out of the well. After taking his bath that day, Shri Raghunath Das Goswami went on his way, but while doing bhajan at night, he took some rest. In a dream, he saw that the Shila was actually the tongue (jihvä) of Shri Giriraj. He also received an order from Shri Giriraj to worship the Shila according to the proper method. He had a temple constructed near the entrance of the Govindadeva Temple and arranged for the Shila to be properly worshipped there. This same Shila can be seen there today. After this event, Shri Das Goswami stopped taking bath with the water of Gopi Kupa and had a new well constructed on the eastern bank of Lalita Kund for bathing. This new well remains there today

यह कुसुम सरोवर गोवर्धन के पास एक जगह है जहाँ श्री नारद मुनी जी ने वृंदा देवी की सलाह पर तपस्या की और वहाँ उन्होंने अपने प्रसिद्ध नारद-भक्ति-सूत्रों में भक्ति सेवा के विज्ञान को समझाया। पुराणों में वृंदावन के उपवासों में श्री नारद कुंड का भी उल्लेख किया गया है। कुंड के बगल में एक मंदिर है जहाँ नारद जी मुनी देवता को देखा जा सकता है। एक दिन जब वह तपस्या में व्यस्त थे तो नारद मुनी जी ने देखा कि वृंदा देवी अपनी कुछ सखियों के साथ गुज़र रही थीं और उन्होंने नम्रता से उनसे आशीर्वाद देने के लिए हठ कि ताकि वह रास-नृत्य को देखने के लिए रास-मंडल में प्रवेश कर सकें। वृंदा देवी ने उन्हें बताया कि उन्हें पहले कुसुमा-सरोवर में स्नान करना चाहिए जिसके बाद उनकी इच्छा पूरी हो जाएगी। पवित्र कुसुम-सरोवर में स्नान करने के बाद नारद मुनी जी ने तुरंत गोपी का रूप प्राप्त किया और श्री राधा रानी और श्री कृष्ण के मध्य रास-नृत्य देखने के लिए रास मंडल में प्रवेश करने योग्य हुऐ।
This is the spot in Goverdhan near Kusum Sarovar, where Shri Narada Muni performed penance on the advice of Vrinda Devi, and the place where he is said to have written his famous Narada-bhakti-sutras explaining the science of devotional service. Naradavana is also mentioned in the Puranas to be one of the upavanas of Vrindavana. There is a temple here next to the kunda where the deity of Narada Muni can be seen. One day while he was engaged in penance, Narada noticed Vrinda Devi passing by with some of her girlfriends and he humbly begged her to bless him so he might enter the rasa-mandala to witness the rasa-dance. Vrinda Devi informed him that he should first take bath at Kusuma-sarovara, after which his desire would be fulfilled. After bathing in the sacred Kusama-sarovara, Narada immediately achieved the form of a gopi and was able to enter the rasa-mandala to see the rasa-dance between Radha and Krishna.

श्री श्याम सुंदर और श्री राधा रानी, जो श्रृंगार रस के अवतार हैं, एक बार अकस्मात लीला के समय वह यहाँ आए और यहां बैठ कर कुंड के पानी को अपने चरणों से डालने और फेकने लगे और खेल खेलने लगे। अपने चरणों को धोने के बाद, वे रस (आनंद) में लीन हो गए। इसलिए युगल सरकार दोनों के चरणों से पूरित यह स्थान चरण कुंड के रूप में प्रसिद्ध है।

स्थान: 
चरण कुंड काम्यवन में स्थित है जो ब्रज मंडल के बारह वनों में चौथा है और यह प्रसिद्ध वनों में से एक है। 
Shri Shyam Sundar and Shri Shri Radha Rani, who are the embodiment of the essence of Shringar Ras, once suddenly during a Leela came and sat down here and started throwing the water out of the kund with their legs and kept playing games. After washing their legs, they became engrossed in ras (Bliss), steeped in some blissful memories. Since then this place with the dust of the feet of both Yugal Sarkar is famous as Charan Kund.

Location:
Charan Kund is located in Kamyavan which is the fourth among the twelve forests of Braj Mandal and it is one of the topmost forests.

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Ashu Sharma
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